Srimad Agrabhagavatam

अदभूत और अलौकिक

विश्व में अव्दितीय

॥ श्रीमद् अग्रभागवतम् ॥

बीजग्रन्थ

सदियों से विलुप्त महर्षि जैमिनी रचित जयभारत ग्रन्थ का यह अंश, कागज से भी पतले महीन,फूलों की पंखुरियों से हल्के, भोजपत्रों पर अदृश्य लिपि में अंकित यह अद्भुत, अलौकिक व दिव्य ग्रन्थ विश्व में अव्दितीय है।

सदियों से विलुप्त, युगदृष्टा श्री अग्रसेन की लोककल्याणकारी जीवन गाथा, एक सिद्ध महर्षि के हस्ते, अत्यन्त रहस्यमयी परिस्थितियों में ९ अगस्त १९९१ को, श्री बेदिल के नाम से विख्यात परमपूज्य आदरणीय श्री रामगोपाल जी अग्रवाल को उपलब्ध हुई।

बीजग्रन्थ फूलों की पंखुरियों से भी हल्के और महीन भोजपत्रों का है। जिस पर गाथा तात्कालीन लिपि में अमिट अक्षरों में अंकित है, और लिपि पानी में पत्र गीले (जलाभिषेक) किये जाने पर अदृश्य अक्षर उभरकर स्पष्ट व सुवाच्य हो जाते हैं।

आहूति

इस महत् कृपा प्रसाद को जन जन में बांटने के लिये, सर्वप्रथम इसके वर्तमान संस्कृत लिपि में लिपिकरण तथा उन्हे श्लोकों में आबद्ध करने की आवश्यकता थी। जन जन तक ये आदर्श पहुंच सकें परमपूज्य श्री बेदिलजी ने ऋषि को प्रदत्त वचनों के अनुरूप कर्तव्य भाव से अपने तन, मन, धन और जीवन की आहूति देकर इस महायज्ञ को सफल किया।

सौभाग्य से

महालक्ष्मी की अनन्त कृपा, श्री अग्रसेन जी के दिव्य प्रकाश, महर्षि जैमिनी के आशिर्वाद, सद्गुरु श्री बृजमोहन जी गौतम के महत् मार्गदर्शन तथा अग्रवाल समाज के मनिषियों, विशिष्ट विद्वानों तथा विभूतियों के शुभ चिंतन के साथ ही, आदरणीय श्री बेदिलजी के सर्वस्व समर्पित सतत् २० वर्षों के तपपूर्ण, श्रमसाध्य भागीरथी प्रयत्नों से, जनकल्याण हेतु जगत के सौभाग्य से, यह सुधा सरिता गंगा की भांति – श्रीमद् अग्रभागवतम् -स्वरूप प्रवाहित हो रही है।

आनन्दमय जीवन का आधार

श्रीमद् अग्रभागवत श्री अग्रसेन की वाङ्गमय स्वरूप अजर, अमर और अविनाशी भगवत आत्मा है, जो उनके गुण,कर्म, प्रभाव व आदर्शों की साक्षी है।

श्री अग्रसेन की यह दिव्य जीवन गाथा अशांत जनमेजय को शांति व आनन्दमय जीवन का पथ प्रदर्शित करने के लिये व्यासजी के प्रधान शिष्य महर्षि जैमिनि द्वारा कही गई, जिसका अनुशीलन व अनुकरण करके सम्राट जनमेजय ने इस लोक में परम यश तथा वयोपरांत परम मोक्ष प्राप्त किया।

आज अशांत विश्व के लिये, श्री अग्रसेन की यह दिव्य जीवन गाथा निश्चित ही शांति व आनन्दमय जीवन का आधार बनेगी।

यह शुभकारी आख्यान जगत में सबके लिये कल्याणकारी हो |

दिव्यता

॥ श्री अग्रभागवत महात्म ॥

ॠृषि गण प्रदर्शित

श्री अग्र भागवत ( श्री अग्रोपाख्यानम् ) की कथा, मरण को उद्यत दिग्भ्रांत, अशांत परीक्षितपुत्र महाराजा जनमेजय को, लोकधर्म साधना का मार्ग प्रशस्त करने की अभिप्रेरणा हेतु – भगवान वेद व्यास के प्रधान शिष्य महर्षि जैमिनी जी द्वारा,सुनाई गई। परिणाम स्वरूप – अशांत जनमेजय ने परम शांति अर्जित कर, मानव धर्म धारण कर – लोककीर्ति तथा परम मोक्ष दोनों ही प्राप्त किये । मॉं महालक्ष्मी की कृपा से समन्वित, भगवतस्वरूप इस परमपूज्य ग्रन्थ की ॠृषियों ने महत्ता दर्शाते हुए स्वयं वंदना की है।

ऋषय ऊचु:
महालक्ष्मीवर इव ग्रन्थो मान्येतिहासक: ।
तं कश्चित् पुण्ययोगेन प्राप्नोति पुरुषोत्तम: ॥

ॠृषि गण कहते हैं- महालक्ष्मी के वरदान से समन्वित होने के कारण स्वरूप, श्री अग्रसेन का यह उपाख्यान ( पुरुषार्थ गाथा ) सभी आख्यानों में सम्मानीय, श्रेयप्रदाता, और मंगलकारी है । जिसे कोई पुरुषश्रेष्ठ पुण्यों के योग से प्राप्त करता है ।

अग्राख्यानं भवेद्यत्र तत्र श्री: सवसु: स्थिरा ।
कृत्वाभिषेकमेतस्य तत: पापै: प्रमुच्यते ॥

ॠृषि गणकहते हैं – श्री अग्रसेन का यह आख्यान (पुरुषार्थ गाथा) जहां रहता है, वहां महालक्ष्मी सुस्थिर होकर विराजमान रहती। अर्थात स्थाई निवास करती हैं । इसका विधिवत अभिषेक करने वाले, सभी पापों से विमुक्त हो जाते हैं ।

ग्रंथदर्शन योगोऽयं सर्वलक्ष्मीफलप्रद: ।
दु:खानि चास्य नश्यन्ति सौख्यं सर्वत्र विन्दति ॥

ॠृषि गणों ने कहा- श्री अग्रसेन के इस आख्यान (पुरुषार्थ गाथा) का सौभाग्य से दर्शन प्राप्त होना, महालक्ष्मीके , अर्थ-धर्म-काम मोक्ष सभी फलों का प्रदायक है । इसके दर्शन कर लेने वालों के, सभी दुखों का विनाश हो जाता है, और सर्वत्र सुखादि की प्रतीति होती है ।

दर्शनेनालमस्यात्र ह्यभिषेकेण किं पुन: ।
विलयं यान्ति पापानि हिमवद् भास्करोदये ॥

ॠृषि गणों ने कहा – जिसके दर्शन मात्र से, सभी पापों का इसप्रकार अन्त हो जाता है, जैसे सूर्य के उदित होने से बर्फ पिघल जाती है । फिर जलाभिषेक के महत्व की तो बात ही क्या ? अर्थात अनन्त महात्म है ।

प्रशस्याङ्‌गोपाङ्‌गयुक्त: कल्पवृक्षस्वरूपिणे ।
महासिध्दियुत श्रीमद्‌ग्रोपाख्यान ते नम: ॥

ॠृषिगण कहते हैं – श्री अग्रसेन के आदर्श जीवन चरित्र के,सभी उत्तमोत्तम अंगों तथा उपांगों से युक्त, कल्पवृक्ष के समान , आठों सिद्धियों से संयुक्त,श्री अग्रसेन के इस आख्यान (पुरुषार्थ गाथा) को, नमन करते हुए ,हम बारम्बार प्रणाम करते हैं।
यह शुभकारी आख्यान जगत में सबके लिये कल्याणकारी हो ।

अध्यात्मिक चिंतन

यह ग्रंथ देवी का आशीर्वाद साबित होगा महालक्ष्मी और

मानव जाति को जीवन में भी मदद करेगा

महालक्ष्मी की कृपा व महाभाग्याशाली श्री रामगोपालजी

बेदिल की कठोर तपस्या का फल है – “श्रीमद् अग्रभागवतम्”

श्री बेदिल के उपनाम से विख्यात श्रीमान रामगोपाल जी को भगवती महालक्ष्मी ने स्वप्न में दर्शन देकर ब्रम्हकंण्ड पहुचने को प्रेरित किया। निर्देशानुसार वे समित्र वहां पहुंचे। अरुणाचल प्रदेश स्थित ब्रम्हसर के निकट एक अलौकिक सिद्धपुरुष ने भुर्जपत्र पर अंकित महर्षि जैमिनी विरचित ‘जयभारत’ ग्रंथ के भविष्यपर्व के अन्तर्गत यह अग्रोपाख्यानम् नामक अदभुत अलौकिक ग्रंथ उन्हे प्रदान किया।

श्री रामगोपाल जी ने जब सिद्धपुरुष द्वारा प्रदत्त इस ग्रंथ को खेलकर देखा तो उसमें सभी पत्र कोरे प्रतीत होते। निरक्षर भुर्जपत्रों के इस ग्रंथ का क्या किया जाए? यह उन्हे कुछ भी समझ नहीं आता था।

अन्तोगत्वा इस ॠषि-प्रसाद की उपयोगिता से अनभिज्ञ होने के कारण श्री बेदिल निराश हो भाव विहल हो उठे।

देवकृपा से उन के आनन्दाश्रु के स्वेदकण ग्रंथ के एक पत्र पर जा पड़े जिससे उन्हे कुछ अक्षर दिखाई दिये। प्राप्त प्रेरणा से अभिभूत हो उनने पत्र पर थोड़ा सा जल सिंचित किया और उस पर अंकित अक्षर, वाक्य, श्लोक स्पष्ट दिखने लगे।

श्री बेदिल महोदय ने शनै: शनै: एक एक पत्र जल में डुबा डुबाकर उभरने वाले उन अक्षरों को यथाक्रम लिखा, उन्हे श्लोकों के स्वरुप में आबद्ध किया। लगभग उन्नीस वर्षों की कठोर तपस्या का फल है – श्री अग्रसेन महाराज के आदर्श चरित्र की यह अनुपम गाथा “श्रीमद् अग्रभागवतम्”।

जल आद्रता से रहित होने पर इस अद्भुत ग्रंथ के अक्षर नहीं दिखाई देते और अधिक आद्रता ग्रंथ सह नहीं सकता। साथ ही ग्रंथ के छिन्न भिन्न हो जाने का भय भी था। तथापि इन महानुभाव के द्वारा न जाने इस ग्रंथ को कैसे अभिषिक्त कर, किस प्रकार अक्षरों का ज्ञान कर, कैसे यह महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किया गया।

तथापि इस ग्रंथ के अभिषेक करने पर अभिषिक्त पावन जल अमृत जल की तरह हो जाता है जो कि विभिन्न आपदाओं व असाध्य रोगों से पीड़ितों की व्याधि निवारण हेतु अमृतसंजिवनी है। इस ग्रंथ इस अनुपम महिमा को अनेकों ने अनुभूत किया है।

महाभाग्याशाली श्री रामगोपालजी बेदिल ने ॠषि प्रदत्त मूलग्रंथ का जिस प्रकार वाचन किया, उसी प्रकार उसका लेखन भी किया है।

महामहिमाशाली इस ग्रंथ में प्रेरणासाद अनेको कथांए व सुक्तियां विद्यमान हैं। जो किसी एक वर्ग के लिये ही नहीं अपितु सभी व्यक्तियों के लिये जीवनोपयोगी है। अखिल भारत व सकल विश्व के लिये यह ग्रंथ निश्चित ही परम उपकारी होगा।

जैसे भुर्जपत्रमयी यह मूलग्रंथ श्री: अमृता महालक्ष्मी सहित माता सरस्वती की अनन्त कृपा के प्रसाद स्वरुप प्राप्त हुआ है, वैसे ही यह जगत कल्याणकारी होगा। ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है।

— दोर्बलप्रभाकरशर्मा शतावधानी
अध्यक्ष, पूर्व आन्ध्र प्रदेश
राष्ट्रीयकार्यकारिणी सदस्य, संस्कृत भारती

ऋषियो के अभिमत

॥ अभिमत ॥

महाराज जनमेजय

श्री अग्र भागवत ( श्री अग्रोपाख्यानम् ) की कथा, मरण को उद्यत दिग्भ्रांत, अशांत परीक्षितपुत्र महाराजा जनमेजय को, लोकधर्म साधना का मार्ग प्रशस्त करने की अभिप्रेरणा हेतु – भगवान वेद व्यास के प्रधान शिष्य महर्षि जैमिनी जी द्वारा,सुनाई गई। परिणाम स्वरूप – अशांत जनमेजय ने परम शांति अर्जित कर, मानव धर्म धारण कर – लोककीर्ति तथा परम मोक्ष दोनों ही प्राप्त किये ।

मॉं महालक्ष्मी की कृपा से समन्वित, भगवतस्वरूप इस परमपूज्य ग्रन्थ की ने महत्ता दर्शाते हुए महाराजा जनमेजय जी श्री अग्रसेन जी के इस पावन चरित्र की वंदना करते हुए कहते हैं।

जनमेजय उवाच ।

एषा धन्यो हि धन्यानां धन्यकृद् धन्यपुङ्‌गव: ।

नरेषु तु सनागेषु नास्ति धन्यतरोऽग्रत: ॥

महाप्राज्ञ जनमेजय ने कहा – ऐसे श्री अग्रसेन धन्य हैं ! धन्य पुरुषों द्वारा भी इन्हें धन्य ही कहा गया है। ये मानव श्रेष्ठ निश्चय ही धन्य हैं। महर्षे ! आपके द्वारा, महाराजा अग्रसेन के उज्ज्वल निर्मल पावन तथा लोक हितकारी चरित्र को सुनकर, मेरा यह स्पष्ट मत है , कि मानवों तथा नागों में श्री अग्रसेन जी से बढ़कर और कोई दूसरा धन्य (श्रेष्ठ) पुरुष नहीं है।

हृदि मे जायते सौख्यं परमं च तवाननात् ।

शृण्वानस्याग्रसेनस्य पिबतश्च कथामृतम् ॥

महर्षे ! आपके श्रीमुख से, श्री अग्रसेन जी के श्रेष्ठ चरित्र को सुनकर इस सुन्दर कथा रुपी अमृत का कर्णपुटों द्वारा पान करके, मेरे हृदय में परम आनन्द उत्पन्न हो रहा है ।

एक एव क्षीरनिधिरिह सन्तापहोच्यते ।

किं पुनश्चरन्द्रकिरणैर्मलयानिलसंयुतै: ॥

सुशीलत्वं स गमित: सुमनोभिरलंकृत: ।

चरितं ह्यग्रसेनस्य श्रुत्वाऽहं ते मुने कृती ॥

हे महर्षे ! अकेला क्षीरसागर ही सदा संतापनाशक कहा जाता है , यदि वह मलयाचल की सुगंधित वायु से संयुक्त हो जाए और उसके अमृत जल को चंद्रमा की किरणें अत्यन्त शीतल कर दें और वह पुष्पों से अलंत हो जाए तो फिर उस क्षीरसागर के स्वरुप का क्या कहना ? हे महामते ! उसी तरह महाराजा अग्रसेन का मनोहारी (गहन, रसमय, मार्गदर्शक) चरित्र , आपके श्रीमुख से कहे जाने से तो निश्‍चय ही अद्वितीय (लोककल्याणकारी) शीतलता से युक्त हो गया ।

श्रवणादेव लप्स्यन्ते प्रतिष्ठाज्ञानसम्पद: ।

अग्रसेनस्य माहात्म्यान्नाधर्मस्तान् भजिष्यति ॥

श्री अग्रसेन के इस पावन चरित्र को सुनने मात्र से, अनुपम वंश प्रतिष्ठा को प्राप्त किया जा सकता है । जो श्री अग्रसेन के इस महात्म को मन में धारण करेंगे, उनके जीवन में, अधर्म का प्रवेश नहीं हो सकेगा ।

जनमेजय जी के द्वारा श्री अग्रसेन जी की इस पावन कथा का श्रवण, चिंतन, व मनन कर, अकारण ही ,जिनके मन में संदेह उत्पन्न होने से, जो अनर्थ की ओर अग्रसित हो गए थे, उन महाराजा जनमेजय को महर्षि जैमिनी द्वारा इस प्रकार समझाने पर, उन्होने श्री अग्रसेन जी के समान ही मानव धर्म के हृष्ट पुष्ट आचरण से परम शांति धारण की । जो मनुष्य इस स्तोत्र का भक्ति पूर्ण श्रवण करता है, मॉं महालक्ष्मी की महत् पा से ‘श्री अग्रसेन जी’ की भांति ही उसकी समस्त कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

एतदाश्चर्यमाख्यानं मया प्रोक्तं सुखावहम् ।

मानवं धर्ममास्थाय कथा पुण्या प्रबोधिता ॥

महर्षि जैमिनी कहते हैं – मेरे मत से, यह आश्‍चर्य जनक आख्यान, सुख को प्रदान करने वाला है । मानव धर्म की यह पवित्र दिव्य एवं मंगलकारी कथा है ।

जगत की जीवन नौका को विपत्ति के भंवर में डूबने से बचाने के लिये महामानव श्री अग्रसेन का उज्ज्वल चरित्र ‘आलोक स्तंभ’ के रुप में विद्यमान है।

यह शुभकारी आख्यान जगत में सबके लिये कल्याणकारी हो ।

 

भगवान श्रीराम के वंशज

भगवान श्रीराम के वंशज : श्री अग्रसेन

महामानव श्री अग्रसेन जी सूर्यवंश में जन्मे। श्री अग्रसेन जी के जन्म के संदर्भ में विश्लेषित करते हुए महर्षि जैमिनी जनमेजय जी से कहते हैं –

इक्ष्वाकुकुलजानां हि शुध्दानां वंश आदित: |
न शक्यते विस्तरेण वक्तुमेकेन वत्सरै: ॥

जैमिनी जी ने कहा – हे जनमेजय ! आप तो जानते ही है इक्ष्वाकु कुल आदिवंश के रूप मे विख्यात है, जो कि परम विशुध्द एवं सात्विक वंश माना गया है इस वंश के, किसी एक का भी विस्तार से वर्णन वर्षो मे भी संभव नहीं है। ज्ञातव्य है कि इक्ष्वाकु कुल मे अनेकों पुण्यकर्मा महापुरुष हुए हैं जिनके प्रेरणास्पद जीवन की कथाएं प्रथक प्रथक अनेकों आख्यानों, उपाख्यानों, तथा विभिन्न पुराणों मे विस्तार पूर्वक विश्लेषित हैं ।

ज्ञातव्य है कि महाराजा श्री अग्रसेन के पुरुषार्थ की यह गौरवगाथा महर्षि जैमिनी जी द्वारा महाप्राज्ञ धर्मज्ञ जनमेजय जी को सुनाई गयी थी, जो वेदों सहित समस्त शास्त्रों व पुराणों के ज्ञाता थे, अतः इक्ष्वाकुकुल के केवल प्रमुख महापुरुषों का ही उल्लेख करते हुए वे कहते हैं –

किर्तिमन्तो हि मान्धाता, दिलीपोऽथ भगीरथ: |
रघु: ककुत्स्थ: सगरो मरुत्तो नृप राघव: ॥

महाराजा इच्छवाकु के इसी कुल मे  महाराज माधान्ता, सगर, दिलीप,भगीरथ, कुकुत्स्य, महाराजा मरूत्त, महाराज रघु, भगवान श्री राम आदि अनेकों कीर्तिवन्त राजा हुए हैं। जिनकी कथाएं जन जन मे पुण्य – स्मरण स्वरूप विद्यमान हैं।

महाराजा इक्ष्वाकु के कुल में राजा अग्निवर्ण के दैवपुत्रों के सदृश्य पांच पुत्र हुए, जिनमें से तीन पुत्रों ने अपने वंश का विस्तार किया। तथा सूर्यकुल की कुल कीर्ति बढ़ाने वाले हुए । राजा विश्वसाह के पुत्र प्रसेनजित हुए, जिन्होने एक अजेय पुरी का निर्माण करवाया। प्रसेनजित के प्रतापी पुत्र वृहत्सेन हुए । वज्रनाभ के कुल मे जिस प्रकार महाराजा मरु के पुत्र वृहद्वल हुए। उसी प्रकार वृहत्सेन के कुल मे राजा वल्ल्भसेन उत्पन्न हुए।

भगवत्त्यां वल्लभेन प्राप्तो वंशकर: सुत: |
मनुष्याग्र्यस्य यस्यासीत् कान्तिश्चन्द्रसमो यथा ॥

राजा वल्लभसेन से विदर्भसुता महारानी भगवती को चंद्रमा के समान कांतिवान मनुष्यों मे अग्रगण्य, एक वंशकर ( अपनी विशिष्टताओं से युक्त शास्त्रानुकूल वंश व्यवस्था की संरचना करने वाला – जिसके नाम से वंशजों को जाना जाए ) ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ।

अतीत्यैकादशाहं तु नामकर्म तदाऽभवत् |
अग्रसेन इति प्रीत: पुरोधा नाम चाकरोत् ॥
श्रुतेऽथ शस्त्रे शास्त्रे च परेषां जीवने तथा |
चक्रे धातोरर्थयोगाद् अग्रनाम्नाऽऽत्मसम्भवम् ॥

जन्म से ग्यारह दिन बीत जाने पर उस बालक का नामाकरण संस्कार किया गया तब पुरोहित ने परम प्रसन्नता से उस बालक का ” अग्रसेन ” नाम निश्चित किया (जो कि लग्न से भिन्न था) । उन्होंने यह विचार करके उस बालक का नाम ‘ अग्र ‘ रखा कि, यह जीवन मे संपूर्ण शस्त्रों एवं शास्त्रों से आगे चला जाएगा । (आगे जाने के) इस अर्थ को सिध्द करने वाले स्वरुप को दृष्टिगत रखते हुए ”अग्र” नाम ही संभव (योग्य या सार्थक) है ।

इस प्रकार श्री अग्रसेन के जन्म का यह वृतांत, इक्ष्वाकु वंश की कीर्ति कथा है। भगवान श्री राम के वंशज हैं : सूर्यकुलभूषण श्री अग्रसेन।

विश्व शांति के आधार

विश्व शांति का सुदॄढ आधार : श्री अग्रसेन

आज शांति की खोज में सारा विश्व अशांत है। विश्व की वर्तमान परिस्थितियां युग संक्रमण काल से भिन्न नहीं। आज वस्तुतः आवश्यकता है – सनातन सभ्यता के पुनुरुत्थान की। जिसकी आधारशिला है : परस्पर प्रेम।

जिसके सहारे किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा भी, सदाचारण से विपुल स्वर्ग सहज ही पाया जा सकता है। मानव जीवन का लक्ष्य है – पूर्णता को प्राप्त करना। सत्, चित्,आनन्द- मय होना। मानव ईश्वर का अंश है, तथापि पथभ्रांत मानव अपने सच्चिदानन्द स्वरूप को भूल, क्लांत-अशांत जीवन जी रहा है ।

भाग्य जब जागते हैं, तो मानव को कोई सतगुरु अवश्य मिलते हैं ,जो उसे उसके ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान करा देते हैं । वह ज्ञान- जो अपने ( ईश्वर ) स्वरूप से विभक्त ( दूर हुए ) जन को, भक्त ( जुड़ा हआ ) बना दे, वही है – ‘भागवत’

महामानव श्री अग्रसेन जी का सम्पूर्ण चरित्र, देश, धर्म व काल की सीमाओं से परे, सारे मानव मात्र के लिये, संजीवनी की तरह, सदैव प्रेरणास्पद, प्रासंगिक, व अनुकरणीय है। लौकिक व पारलौकिक साधना का उत्तमोत्तम मार्ग है ।

परीक्षितपुत्र जनमेजय को सम्राट पद पर अभिषिक्त किया गया। धर्मज्ञ, प्रजावत्सल महाराजा जनमेजय में, अपने धर्मज्ञ होने का अहंकार जब समा गया तो उनके द्वारा किए गए यज्ञ में अहंकार के परिणाम स्वरुप उत्पन्न भ्रम से भ्रमित हुए महाराजा जनमेजय विचलित हो गए, और वे कुपित हो उठे । उन्होने इन्द्र को शाप दे दिया । ऋृत्विजों को अपमानित कर राज्य से निकाल दिया, और पतिव्रता पत्नी ‘महारानी वपुष्टमा’ को कुलटा घोषित कर, मसले हुए फूल की माला की तरह ठोकर मारकर, राजमहल से निष्काषित कर, उन्हे भगा दिया ।

सचिन्त्य घोरमत्यन्तं शांन्तिं न प्राप्नुते क्षणम् |
चिंताशोकपरीतात्मा मन्युना जनमेजय: ॥

कुरुकुल भूषण जनमेजय, बीते हुए भयंकर अतीत का स्मरण करके , क्षण भर भी, शांति नहीं पाते थे, उनका मन चिन्ता और शोक में डूबा हुआ था ।

तत् सामर्षं शोचमानम् क्रुध्दं पारिक्षितं नृपम् |
व्यासाशिष्यो वेदवित् स वच: प्रोवाच जैमिनि:॥

महाराजा श्री अग्रसेन एक ऐसे कर्मयोगी लोकनायक थे, जिन्होंने संघर्षं पूर्ण अपने आदर्शमय जीवन कर्मों से सकल मानव समाज को मानवता का पथ दर्शाया। उनका जीवन दर्शन चैतन्य आनंद की अगणित विशिष्टताओं से सम्पन्न, पवित्र, जगत के सब प्राणियों के लिये सुलभ, एवं सबके के लिये सुखद व समस्त जगत में शांति व सद्भाव का प्रदायक हो सकता है। भ्रमों में भटके वर्तमान विश्व में नवजीवन संचारित करने में सक्षम इस पुरुषार्थ गाथा के संदर्भ में ऋृषियों का कथन है –

एवं राजा सम्प्रणीतो मिथ्थ्या व्याशङि्‌कतात्मना ।
चकार शान्तिं परमां नृधर्मं जनमेजयात् ॥

अकारण ही जिनके मन में संदेह उत्पन्न होने से, जो अनर्थ की ओर अग्रसित हो गए थे, उन महाराजा जनमेजय को महर्षि जैमिनी द्वारा इसप्रकार ‘श्री अग्रसेन की यह पावन गाथा’ समझाने पर, उन्होने श्री अग्रसेन जी के समान ही मानव धर्म के हृष्ट पुष्ट आचरण से परम शांति धारण की ।

एतदाश्चर्यमाख्यानं मया प्रोक्तं सुखावहम् ।
मानवं धर्ममास्थाय कथा पुण्या प्रबोधिता ॥

महर्षि जैमिनी कहते हैं – मेरे मत से, यह आश्चर्य जनक आखयान, सुख को प्रदान करने वाला है। मानव धर्म की यह पवित्र दिव्य एवं मंगलकारी कथा है । जगत की जीवन नौका को विपत्ति के भंवर में डूबने से बचाने के लिये महामानव श्री अग्रसेन का प्रकाशवान चरित्र आलोक स्तंभ के रुप में विद्यमान है। जब मानव में मानव होने का गौरव जागृत होता है, तो स्वतः ही विकृतियां शिथिल पड़ने लगती हैं। आवश्यकता है – हम स्वयं को पहिचानें।

क्षमतावान

पराक्रम के प्रांगण में क्षमतावान : श्री अग्रसेन

महाभारत के युद्ध के समय श्री अग्रसेन साढ़े पंद्रह वर्ष के थे।भगवान श्रीकृष्ण के भी बहुत समझाने एवं अनुनय विनय करने पर भी, पाण्डवों को उनके पूर्वजों द्वारा अर्जित राज्य देने के, समस्त प्रस्तावों को, जब कौरवों ने नकार दिया तब सत्य तथा धर्म की रक्षा हित युद्ध आवश्यक हो गया तो युद्ध में अपने पक्ष से संघर्ष हेतु, सभी मित्र राजाओं को दूतों द्वारा निमंत्रण भेजा गया।

पाण्डवदूत ने श्री वृहत्सेन की महाराज पाण्डु से मित्रता को स्मृत कराते हुए, राजा वल्ल्भसेन से अपनी सेना सहित युद्ध में सम्मलित होने का निमंत्रण दिया। महाराज वल्लभसेन ने पाण्डवदूत को आश्वास्त किया। तब, युवराज श्री अग्रसेन ने अपने युद्ध में सम्मलित होने का, अपना महत्वपूर्ण मनोगत सहर्ष व्यक्त किया। किन्तु श्री अग्रसेन की बाल सुलभ अवस्था को दृष्टिगत रखते हुए जब उन्हे युद्धभूमि में न्यस्त करने में, महाराज वल्लभसेन ने असहमति दर्शाई, तो श्री अग्रसेन ने अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए निवेदित किया –

अधुर्यवच्च वोढव्ये मन्ये मे मरणं हि तत् |
भवान् तात व्दितीयं मां सहायं नय मा चिरम्॥

हे भवान ! पिताश्री !यदि मेरे जैसा वीर युवक समय पर ,पराक्रम का प्रदर्शन न करे, भार ढोने के समय बिना नथे हुए बैल के समान बैठा रहे, मेरे मत में यह तो – उसके लिये तो मरण के सदृश्य ही है, अतः आप योद्धा के रुप मे न सही, पिताश्री ! मुझे अपने द्वितीय सहायक के रुप में ही , अवश्य ले चलिए। अब इस कार्य में विलम्ब, योग्य नहीं।

राजा वल्लभसेन पुत्र के, इसप्रकार, मन को प्रिय लगने वाले वचनों को सुनकर ,गद्गद् हो, उसे अपने सीने लगा लिया। उसीप्रकार माता विदर्भनन्दिनी भगवती देवी ने वीरांगना की भांति अपने पुत्र को धर्मयुद्ध में जाने की न केवल स्वीकृति अपितु आदेश देते हुए कहा –

सत्यधर्माभिरक्षार्थं पुत्र गच्छ ममाज्ञया॥

माता वैदर्भी ने कहा – हे पुत्र ! तुम वीर हो ! अपने सत्य तथा धर्म की रक्षा हित तुम इस युद्ध में अवश्य जाओ यह मेरा आदेश है ।
माता विदर्भनंदिनी ने श्री अग्रसेन की भावना को जानते हुए ही यह बात कही –

सत्यार्थे धर्मकामार्थे त्वयास्म्यग्र सपुत्रिका |

वत्स अग्रसेन ! मैं जानती हूं कि सत्य की विजय हेतु, धर्म की स्थापना के लिए, क्षत्रियों के लिए, नियतकर्म करने के लिए ही, तुम इस महायुद्ध में सम्मिलित होने जा रहे हो।माता वैदर्भी की आज्ञा प्राप्त कर कुमार श्री अग्रसेन भी महाभारत युद्ध में सम्मलित हुए। युद्धभूमि में दसवें दिन भीष्मपितामह के बाणों से बिंधकर महाराजा वल्लभसेन वीरगति को प्राप्त हो गए। अट्ठारह दिन युद्ध चला। कौरव विनिष्ट हुए। युद्ध समाप्त हु

कुमारस्याग्रसेनस्य युद्धेऽपश्यं महब्दलम् |
पितुर्वधेन सन्तप्तोऽप्यहंश्च शतशोऽप्यरीन् ॥

महाराजा युधिष्ठिर ने कहा – वत्स ! मैंने युद्धभूमि में, कुमार अग्रसेन के महाबल को देखा है ( महाबल = युद्धकला युक्तशक्ति एवं धर्मबल से युक्त दयालुता ) जब पिता के वध का संताप हृदय में गहन रोष पैदा कर रखा होगा, तब भी सैकड़ों निशस्त्रों एवं दया-याचकों को युद्धस्थल में जीवनदान देनेवाला यह अग्रसेन वास्तव में ‘धर्मवीर’ है ।

कृपाविष्टेन मनसा युद्धक्षेत्रगतोऽप्यसौ|
अग्रसेनस्त्वयं धन्यो येनात्मविजय: कृत:॥

महाराजा युधिष्ठिर ने कहा – जिस वीर पुरुष के हृदय में युद्धक्षेत्र में जाने के बाद भी, करुणा विद्यमान रहे, ऐसा वीर – वत्स अग्रसेन धन्य है । धन्य है – अग्रसेन ! जिसने मेरी आत्मा पर विजय प्राप्त कर ली है।

वस्तुतः श्री अग्रसेन का यह सुकृत्य उनकी क्षमा से युक्त क्षमता का प्रतिपादक है। क्षमता तभी पूज्य होती है जब हृदय में प्राणी मात्र के प्रति ममता का भाव विद्यमान हो, इसीलिए धर्मराज युधिष्ठिर ने इसप्रकार श्री अग्रसेन जी की क्षमता की प्रशंसा की।

भगवान श्री कृष्ण के आशीर्वचनों तथा पाण्डवों के स्नेह से परिपूर्ण, क्षमता के धनी श्री अग्रसेन ने कुमार अवस्था में ही पराक्रम के प्रांगण में जो क्षमता दर्शायी वह मानव मात्र के लिए, एक आदर्श शलाका की भांति सदैव प्रज्वलित होती रहेगी।

श्री अग्रसेन के आदर्शमय यथार्थ जीवन में पग पग पर ऐसे अनेकों उदाहरण विद्यमान हैं।

समता के समन्वयक

समता के समन्वयक : श्री अग्रसेन

कर्मयोगी लोकनायक महाराजा श्री अग्रसेन का ”समता” का सिद्धान्त सामाजिक दायित्व का ऐसा उपकारहीन उपक्रम है, जो ‘समाजवाद’ से

अनन्त श्रेष्ठ मानवता का पोषक तथा सर्वलोक कल्याण का अनुपम व अनोखा व एकमात्र आदर्श उदाहरण है।

विभेद चाहे समाजिक रहा हो, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक या मानवीय, श्री अग्रसेन ने सभी विभेदों को अपने लोक-व्यवहार से दमन कर सबके प्रति समान अनुभूति अपना कर, सारे जगत को मानवता का संदेश दिया।

”समता सर्वभूतेषु” की भावना से मंगलमय समाज की संरचना करने वाले श्री अग्रसेन ने प्राणीमात्र के सर्वोत्थान को लक्ष्य कर सामाजिक विषमता नाशक, अपने जीवन का स्वरूप निर्धारित किया। दुर्भाग्यवश किसी व्यक्ति के विपन्न हो जाने पर, उसके स्वाभिमान की सुरक्षितता के साथ उसके उत्थान की व्यवस्था करने हेतु आग्रेय गणराज्य में लागू किया गया ”समता का नियम” सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था के इतिहास में अद्वितीय व प्रांजल्य है। इस संदर्भ में श्री अग्रसेन के वचन दृष्टव्य हैं कि –

आनृश्यंस्यं परो धर्म: याच्यते यत् प्रदीयते ॥

याचक को दिया गया दान ही, मनुष्य का दया रुपी परम धर्म है ।

कृशाय कृतविद्याय वृत्तिक्षीणाय सुव्रत ।
क्रिया नियमिता: कार्या: पुत्रैर्दारैश्च सीदते ॥
अयाचमाना: सर्वज्ञा: सर्वोपायै: प्रयत्नत: ।
ते रक्षणीया विव्दांस: सर्वकामसुखावहै: ॥

जो व्यक्ति विद्वान अथवा योग्य होने के बावजूद, भाग्यवशात् अपनी आजीविका के क्षीण हो जाने के कारण दीन ( निर्धन ) हो जाते हैं, तथा स्त्री पुत्रादिकों के पालन कर सकने में असमर्थ हो जाने के कारण, अनेकों कष्ट उठाते हैं। तथापि किसी से याचना नहीं करते ऐसे (स्वाभिमानी) पुरुषों को प्रत्येक उपाय से सहयोग देने के लिये प्रयत्न करना चाहिये। उनकी उपयुक्त आवश्यकताओं की जानकारी लेकर, उनके सुख की स्थापना हेतु, समुचित कर्म करना चाहिये।

श्री अग्रसेन ने निर्देश देते हुए स्पष्ट इंगित किया है, कि दान देने से भी श्रेष्ठ कृत्य, दूसरों की आजीविका का प्रबंध करना है, और यह कर्म उपकार की नहीं, कर्तव्य की भावना से किया जाना चाहिये। कारण –

अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चापि ये परे ।
कस्तेषां जीवितेनार्थस्त्वां विना बन्धुराश्रय: ॥

छोटे, बड़े तथा जो बडे से भी बडे हैं, या उनसे भी आगे हैं, परस्पर बन्धुजनों के आश्रय बिना, उनके जीवन का क्या प्रयोजन है ? अर्थात् – ऐसे लोग जो छोटे-बडे, अमीर- गरीब, के विभेद से परस्पर सौजन्य से हीन हों उनका जीवन निरर्थक है।

प्रत्येक समाज में अपने अपने भाग्य के अनुकूल, व्यक्ति सम्पति, ज्ञान, बल, ऐश्वर्य आदि से कम ज्यादा होते ही हैं, कुछ निर्धन, अज्ञानी, कमजोर, होते हैं, और कुछ उनसे सशक्त, धनवान, ज्ञानी, कुछ उन सबसे आगे और कोई विशिष्ट श्रेयता को प्राप्त सबसे आगे। किन्तु परस्पर अपने दीन हीन बन्धुओं के प्रति श्रेयता प्राप्त लोगों में बन्धुत्व भाव का अभाव होने पर, सौजन्यता बिना उनका जीवन निरर्थक हो जाएगा, अतः समाज में कभी भी विभेद की परिस्थिति पैदा न होने देना चाहिए, अतः

सर्वोत्थानाय सश्रद्धं भ्रातृभावेन चावह ।
योगं क्षेमञ्च मन्वान: गृह्णीयुस्तेऽभिमानत: ॥

सर्वोत्थान की दृष्टि से, बंधुभाव से, श्रृद्धायुक्त ( ऐहसान जताते हुए नहीं, ) और पवित्र मन से (लोकेष्णा के स्वार्थ से रहित) ‘योगक्षेम’ की (यह मेरा कर्तव्य है इस प्रकार मानकर) कर्तव्य बुद्धि से, सामदायिक विकास की दृष्टि से, परस्पर सहयोग का निर्देश करते हुए, श्री अग्रसेन ने ”आग्रेय गणराज्य” में ”समता का नियम” लागू करने हेतु आव्हान कि –

देयानि वृत्तिक्षीणाय पौरैरेकैकश: क्रमात् ।
गत्वा निष्केष्टिकां दद्यु: जनः कुर्यान्नयाचनाम् ॥

इसलिये, आज से इस राष्ट्र ( आग्रेय ) में, जो भी व्यक्ति भाग्यवशात यदि आजीविका से हीन हों, उन्हे बिना याचना किए ही, राज्य के सभी निवासी ( निष्क = रुपया ) और एक एक ईंट स्वयं उनके पास जाकर भेंट स्वरुप दें।

ज्ञातव्यः – द्वापर के उस अन्तिम चरण में विनिमय की दृष्टि से ( निष्क = धातुअंश जो प्रचलन में रहा होगा वह)’स्वर्णमुद्रा’ को हम आज विनिमय के आधार रुपये के रुप मे – ‘रुपया’ कह सकते है। इस रुपये ईटं के नियम को लागू किये जाने के मूल में महाराजा अग्रसेन की जो भावना निहित है उस पर चिन्तन की आवश्यकता है। वस्तुतः इस नियम के मूल में आवश्यकता है :-

१ – ऐसे व्यक्ति की, जो याचना नहीं करता किन्तु उसे सहयोग दिया जाना चाहिये, सामाजिक स्तर पर ऐसे व्यक्ति की, तलाश करनी चाहिये। समाज को ध्यान रखना चाहिये एक दूसरे का।
२ – सद्भावना पूर्वक ऐसे व्यक्ति की आजीविका के प्रबंध हेतु राज्य के, समाज के, सभी बंधुओ को ऐसे व्यक्ति के उत्थान का सम्मलित प्रयास करना चाहिये।
३ – भेंट स्वरुप प्रदान करने वाले में न तो उपकार का अहंकार उपजता और न ही भेंट स्वीकार करने वाले को स्वाभिमान को ठेस पहुंचती।

एष ते विततं वत्स सर्वभूतकुटुम्बकम् ।
विशिष्ट: सर्वयज्ञानां नित्यमत्र प्रवर्तताम् ॥

इस प्रकार सब प्राणियों के प्रति कुटुम्बवत समत्व स्थापना के इस पुनीत कार्य का जो विस्तार होगा, वह सभी यज्ञों से बढ़कर है, अतः तुम लोगों को, इस ”कर्मयज्ञ” को सदैव गतिशील रखना चाहिए।

हे मानवों ! यदि तुम इस प्रकार करोगे तो वह निश्चय ही जगत में तुम्हारे लिये व जगत के लिए परम कल्याणकारी होगा।

  • निवेदन जन-जन में समता स्थापित कर, बन्धुत्व की भावना विकसित करना, व्यक्ति के, समाज के, राष्ट्र के तथा मानवता के कल्याण का सूत्र है । ‘समाजवाद’ या ‘साम्यवाद’ जैसे सीमित शब्द से इस व्यवस्था का आकलन करना, इस समता के सर्वलोक कल्याणकारी स्वरुप की गरिमा को क्षीण करना ही है। विदुजन ‘महाराजा अग्रसेन’ के इस समता के सिद्धांत की अर्न्तभावना का यर्थाथ चिंतन कर, उसे प्रकाशित करने का प्रयत्न करें, हमारा यही विनम्र निवेदन है।

संस्कृतियों के समन्वयक

परस्पर विरोधी संस्कृतियों के समन्वयक : श्री अग्रसेन

ऐतिहासिक सत्य है कि वैष्णव (आर्य) एवं शैव (नाग) संस्कृतियां परस्पर विरोधी रही हैं। साम्प्रदायिक दुर्भाव तथा धर्मान्धता के दुर्गुणों के कारण मानवीय इतिहास, भयंकर द्वंदों तथा रक्तपात के दुराचरण से सदा कलंकित होता रहा है। नागराज महीधर, वैष्णवों से द्वेष भाव रखते थे, वे यह सोचते थे कि वैष्णव शिवद्रोही हैं, (नाग संस्कृति के पोषक नागराज, भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के, नागों से वैर की भावना के वशीभूत) वे सदैव वैष्णवों के दोष ही ढूंढा करते थे। उनका मानना था कि –

यथा पुष्करपत्रेषु पतितास्तोयबिन्दव: ।
तथा न श्लेषमिच्छन्ति ज्ञातय: स्वेषु सौहृदम् ॥

जैसे कमल के पत्तों पर पर गिरी हुई पानी की बूंदे, उसमें अधिक देर नहीं टिकती, वैसे ही आर्यों के हृदय में, परस्पर सौहाद्र अधिक देर नही टिकता। ऐसे वैष्णवों के अनकों दोषों का बखान करते हुए उनका मत था –

हृष्यन्ति व्यसनेष्वेते ज्ञातीनां ज्ञातय: सदा ॥
नागकन्यां प्रार्थयानस्त्वं नाप्यामकृतात्मभिः ।

वहां ( वैष्णव ) सर्वदा अपने अन्य सजातीय बंधुओं के दुख में या आपत्ति में पडने पर ही हर्ष मनाते हैं । जिनका अन्तःकरण शुध्द नहीं है, अथवा जो पुण्यात्मा नहीं है, उन वैष्णवों के लिये नागकन्या की प्राप्ति असंभव है।

नागराज का ऐसा विचार उनके आर्यों के प्रति द्वेष भाव तो था ही, इसीलिए उन्होने स्वयंवरा माधवी जी का विवाह देवराज इन्द्र के साथ करने का निश्चय कर रखा था। जबकि नागलोक की परम्परा के अनुकूल कन्या स्वयं वर का चयन करती थी। नागसुता माधवी जी ने श्री अग्रसेन के परम दयाभाव को देखते ही मन ही मन उनका वरण कर लिया था। तथापि नागपाश बंधन से विमुक्त श्री अग्रसेन ने अपनी चैतन्य बुद्धि व दिव्य ज्ञान के प्रकाश से नागराज व उनकी सभा को विनम्रतापूर्वक पराभूत कर दिया। इस संदर्भ में महर्षि जैमिनी जी का कथन दृष्टव्य है –

युवा मतिमतां श्रेष्ठो ज्ञानविज्ञानकोविद: ।
सर्वानेव निजग्राह चकार निरुत्तरम् ॥

जैमिनीजी कहते हैं – श्री अग्रसेन युवा होकर भी , श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त तथा ज्ञान विज्ञान में प्रवीण थे, इसलिये अपने तर्क पूर्ण आग्रह वचनों से, उन्होंने नागलोक के उन सभी को निगृहीत करते हुए, निरुत्तर कर दिया ।

महामानव श्री अग्रसेन ने ‘वैष्णव-शैव’ परस्पर विरोधी संस्कृतियों में समन्वय स्थापित करने का जो अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है, वह साम्प्रदायिक सदभाव की प्रेरक शक्ति बने। दो भिन्न संस्कृतियों के इस गंगा-जमुनी मिलन के अनुपम ‘श्री अग्रमाधवी’ विवाहोत्सव के रोचक प्रसंग दृष्टव्य हैं-

वर्गावुभौ नागनराधिपानां व्दारेऽपिधाने ह्युभयप्रदेशात्‌।
समीयतुर्व्दावपि भिन्नवेषौ भन्नैकसेतू पयसामिवोघौ ॥

जब, वर और कन्या दोनों पक्ष वाले, वे ( दो भिन्न संस्कृतियां) नाग और नर एक द्वार पर आकर मिले, तो ऐसा लगने लगा कि जैसे – बांध के टूट जाने पर अलग – अलग नदियों की दो धाराएं आकर परस्पर मिल गई हों ।

वैवाहिके कौतुक संविधाने वर्गावुभौ नागनराधिपानाय् ।
एकीकृतौ सानुमतोऽनुरागादस्तान्तरावेक कुलोपमेयम् ॥

विवाह के इस उत्सव में, नाग और नर दोनों ही वर्ग, वहां प्रेममय, एकरस होकर इस प्रकार मिल रहे थे, कि सभी विभेद मिट गए। तब ऐसा लगने लगा कि जैसे वे एक ही कुल के हों। दो संस्कृतियों के, दो सभ्यताओं के, ऐसे मनोहारी मिलन की स्मृति को जीवंत रखने हेतु, नागराज महीधर ने अपने नागलोक के तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, और पाताल इन सात लोकों में से एक तल (राज्य) सांस्कृतिक समन्वय के पुरोधा श्री अग्रसेन के नाम से ”अग्रतल” के रुप में घोषित कर दिया –

अग्रस्य नाम्ना भाषेरन् इमं लोकं तलोत्तमम्‌ ॥

नागराज महीधर ने कहा – ” अग्रस्य नाम्ना भाषेरन् इमं लोकं तलोत्तमम् ” इस नागलोक का यह उत्तम तल (राज्य) आज से श्री अग्रसेन के नाम से पुकारा जाएगा ।

सुसंस्कृतेभ्य: सर्वेभ्य: रमणीयो भविष्यति ।
इदमग्रतलं नाम्ना त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्‌ ॥

दोनों संस्कृतियों (शैव और वैष्णव संस्कृति) का यह सम्मलित केन्द्र अत्यंत मनोहर प्रदेश ”अग्रतल” के नाम से (देवलोक,नागलोक,मानवलोक) तीनों लोकों में प्रसिद्ध होगा ।

सर्वरत्नाकरवती सर्वकामफलद्रुमा ।
सर्वाश्रमाधिवासा साऽग्रतलाख्य गुणैर्युता ॥

इस तल पर जो नगर बसेगा (बसाया जाएगा) वह सब प्रकार के रत्नों की खान होगा। यहां के वृक्ष सम्पूर्ण मनोवांच्छित कामनाओं को, फल के रूप में प्रदान करने वाले होंगे सभी आश्रमों के लोग यहां निवास करेंगे, और यह नगर समस्त अभिलाषित गुणों से परिपूर्ण होगा।

सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक वह श्री अग्रसेन जी का विवाह स्थल ”अग्रतल” आज भी अगरतला के रूप में विद्यमान है और वर्तमान में त्रिपुरा की राजधानी है।

श्री अग्रसेन जी के इस सांस्कृतिक सामन्जस्य के ऐतिहासिक प्रयास ने वैष्णव एवं शैव संस्कृतियों तथा विचारधारओं को एक नए दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया जो सारे विश्व के विभिन्न दर्शनों में अद्वितीय है एवं आज के विषैले साम्प्रदायिक तथा धर्मान्ध वातावरण से ग्रसित विश्व के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक व मार्गदर्शक भी ।

नारी गरिमा के प्रतिपादक

नारी गरिमा के प्रतिपादक : श्री अग्रसेन

जब स्वयंवरा नागकन्या माधवीदेवी ने, श्री अग्रसेन जी के ऊंचे कन्धों के मध्य शोभित गले में, परम सुन्दर फूलों का हार डालकर, उनका पति रूप में वरण कर लिया। तदुपरांत, नागराज महीधर ने, अपनी अन्य कन्याओं को सम्मुख करते हुए कहा – जंवाई राज श्री अग्रसेन ! आप मेरी इन अनुराग तथा उत्तम भक्ति से युक्त कन्याओं के साथ भी मंत्रोच्चार सहित पाणिग्रहण कीजिये ।

तब, व्याकुल तथा व्यथित होकर मनस्वी श्री अग्रसेन ने नागेन्द्र के अभिमत को नकारते हुए उनसे अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा –

कथं नु वा मनस्विन्या: माधव्या: पाणिपङ्‌ग्कजम्  ।
गृहीत्वा नागदुहितु: लोकेऽधर्मं चराम्यहम् ॥

हे नागराज! मैं मन को वश में रखने वाला मनस्वी पुरुष, लोकधर्म का उत्तम आचरण करने वाला, नागराज की दुहिता माधवी देवी का वरण कर लेने के उपरांत अब, अन्य का पाणिग्रहण कैसे कर सकता हूं ? अर्थात्‌ कदापि नहीं कर सकता।

अनियोज्ये नियोगे मां न निभुङ्‌क्ष्व महामते ।
भगिन्यो धर्मतो या मे तत्स्पर्शं त्वं कथं वदे:॥

हे श्रेष्ठज्ञान सम्पन्न नागेन्द्र ! इस प्रकार तो आप मुझे ऐसे अनुचित कार्य में लगाना चाह रहे हैं, जो कदापि योग्य नहीं है, पत्नी की अन्य बहिनें, ये सब मेरे लिये धर्म की दृष्टि से बहिनें ही हैं, अतः आप मुझसे भला इस प्रकार कैसे कह रहे हैं। अर्थात्‌ आपका कथन कदापि उपयुक्त नहीं ।

श्री अग्रसेन की भावनाएं उपरोक्त कथन से स्पष्ट हैं, साथ ही उन्होने इसे अधर्म मानते हुए नागराज से विनम्रता पूर्वक निवेदन किया –

अधर्मात् पाहि नागेश मां धर्मं प्रतिपादय ॥

हे निष्पाप नागेन्द्र ! आप मुझे इस तरह अधर्म में न डालें, अधर्म से बचाइये और मुझे धर्म का पालन करने दीजिये, मुझे धर्म पथ पर चलने दीजिये।

इसप्रकार श्री अग्रसेन को दृढ़वती व धर्मपथ पर अडिग देख, नागराज महीधर ने उन्हे अनेकों प्रकार से बहलाने, फुसलाने, व मनाने के विफल प्रयास किए, अन्तोगत्वा द्रोपदी के प्रसंग को आधार बनाकर, कटाक्ष करते हुए वे बोले-

नृपस्य बहव्यो विहिता महिष्यो लोकसम्मता:।
श्रूयन्ते बहव: पुंस: एकस्या: पतयोऽपि च

हे राजन ! आपके नर लोक के राजाओं की अनेक रानियां होना तो लोकमान्य है ही, किन्तु हमने तो सुना है कि वहां एक ही कमनीय नारी के अनेक पुरुष पति भी होते है ? क्या यह सच नहीं ?

नरेन्द्र ! मैं तुम्हे बहु विवाह की अनुमति प्रदान करता हूं। आप संकोच न करें, इन सबका क्रमशः पाणिग्रहण करें। आपको इस विषय में किसी प्रकार की ( पाप, पुण्य, लोककथन, नीति, धर्म आदि ) चिन्ता नहीं करना चाहिये।

तब नारी की गरिमा तथा महत्ता प्रतिपादित करते हुए श्री अग्रसेन जी ने कहा –

अधर्मोऽयं मतो मेऽद्य विरुद्धो लोकगर्हित: ।
ततोऽहं न करोम्येवं व्यवसायं क्रियां प्रति ॥

श्री अग्रसेन ने कहा – हे नागराज ! (जैसा आपने कहा) मेरी राय में तो, यह अधर्म ही है, और यह लोक तथा लोकहित दोनों के विरूद्ध है, इसलिये मैं लोक-धर्म विरोधी ऐसे आचरण को, व्यवहार में कदापि नहीं ला सकता ।

आत्मनो य: श्रुतो धर्म: स धर्मो रक्षति प्रजा: ।
शरीरं लोकयात्रां च धनं स्वर्गमृषीन् पितृन् ॥

हे नागराज ! पत्नी, पति का आधा अंग होती है, यह श्रुति का स्पष्ट वचन है। वह धर्म सहित, प्रजा, शरीर, लोकजीवन, धन, स्वर्ग, ऋृषि तथा पितरों आदि इन सबकी रक्षा करती है।

कृतदारोऽस्मि नागेन्द्र भार्येयं दायिता मम ।
पुरुषाणां च नारीणां सुदु:खा ससपत्नता ॥

हे नागेन्द्र ! मैं विवाह कर चुका हूं। ये मेरी प्रिय पत्नी ( माधवी ) विद्यमान है। सौत का रहना केवल नारी के लिये ही अत्यंत दुःखों का कारण नहीं, अपितु पत्नी की सौत का होना, पुरुष के लिये भी सदा ही दुःख का कारण रहता है।

इस प्रकार अपने एक पत्नी धर्म पर दृढवती श्री अग्रसेन ने नारी की गरिमा प्रतिपादित करते हुए अपना दृढ़ निश्चय निर्णयात्मक शब्दों में कहा –

न चान्यासां पतिरहं सत्यमेतत् वचो मम ॥

अब इन माधवी देवी के अतिरिक्त मैं अब अन्य किसी का पति नहीं हो सकता। यह मेरा सत्य वचन है।

आइने की भांति साफ है कि बहुपत्नी प्रथा के उस काल में भोगवादी संस्कृति पर अंकुश लगाते हुए महामानव श्री अग्रसेन ने नारी की गरिमा स्थापित करने में जो क्रांतिकारी योगदान दिया वह सारे मानव समाज के लिए प्रेरणास्पद प्रकाश स्तंभ है।

अहिंसा का दिव्य आलोक

अहिंसा का दिव्य आलोक : श्री अग्रसेन

पुण्य जीवन के भव्य मंदिर की नींव है – अहिंसा । अहिंसा वृत्ति के बिना न व्यष्टि का कल्याण संभव है और न ही समिष्टि का। सबसे ऊंचा मानवीय आदर्श जिसकी कल्पना मानव कर सकता है वह है- अहिंसा। महाराजा श्री अग्रसेन के हृदय में न केवल मानवमात्र के प्रति, अपितु प्राणीमात्र के प्रति दया व ममत्व भाव विद्यमान थे।

महर्षि गर्ग के आदेशानुसार महाराज श्री अग्रसेन नागलोक(पूर्वांचल प्रदेश) पहुंचे, और महर्षि उद्दालक के निर्देशानुसार वे परम ज्योर्तिलिंग ‘हाटकेश्वर’ के दर्शन कर, मणिपुर के उस उपवन में विश्राम कर रहे थे।

उपवन के सरोवर में नाग कन्याएं नागराजसुता ”माधवी जी”के साथ जल क्रीड़ा कर रहीं थीं। तभी, जल पीने के लिये, सांडों सहित, गायों तथा बछडों का समूह वहां आ पहुंचा। और सरोवर को घेर लिया। उसी समय, कोई हिंसक व्याघ्र (सिंह), भयावह घोरनाद करता हुआ वहां आ पहुंचा । जिसकी भीषण गर्जना से गायें, बछडें के साथ ही शांत हो गई, और भयातुर होकर कांपने लगीं।

स दृष्ट्वा चिन्तयित्वाऽग्र: सद्य: सत्यपराक्रम: ।
श्रेष्ठो धनुष्मतां वीरो दयाभावसमीरित: ॥

यह देखकर, (वहां विश्रांति कर रहे) सत्य सरंक्षक, पराक्रमी, श्रेष्ठ धनुर्धर, वीर श्री अग्रसेन का हृदय दया भाव से भर गया और पीडित मन से वे, गौ कुल के सरंक्षण हेतु विचार करने लगे।

ररक्ष विधिना गाश्च  बाणैर्व्याघ्रमताडयत् ।
शरसंनिचयस्थोऽयं तं गाव: पर्यवारयन् ॥

और तब , श्री अग्रसेन ने, उन गायों की रक्षा की भावना से, संरक्ष्य विधि से इस प्रकार बाण चलाए कि, व्याघ्र के चारों ओर बाणों के समूह का घेरा खडा कर दिया । और सहसा आए इस संकट से, सब को (गौकुल, नाग कन्याएं व सिंह सभी ) मुक्त कर दिया ।

अहिंसा’ दयाभाव तथा जीव मात्र के प्रति ममता का ऐसा उदाहरण सकल सृष्टि में अन्यत् कहीं दिखाई नहीं देता। हिंसक जीव की भी हिंसा ना करते हुए उसे केवल अवरुद्ध करके, उसके प्रति भी दया भाव दर्शाने वाले ‘महाराजा अग्रसेन’ का यह अद्‌भुत कर्म, मानवता का परम पोषक है, एवं सकल मानवमात्र का मार्गदर्शक भी, वस्तुतः श्री अग्रसेन जी का यह उपक्रम जीवमात्र के प्रति उनकी, न केवल सहानुभूति, अपितु समानानुभूति का भी अनुपम व दिव्य उदाहरण है ।

अहिंसा का जयघोष तो अक्सर सुनाई देता है, किन्तु केवल तोता रटंत की तरह। ”अहिंसा” की गूंज की आवश्यकता, मंदिरों के घड़ियालों में नहीं, वहां है – जहां हिंसा ताण्डव नृत्य कर रही है। पौराणिक भारत में जब स्वर्ग साधना स्वरूप, यज्ञों में पशुबली प्रचलित थी, तब श्री अग्रसेन के अहिंसा के पुण्य सिद्धांत साधना ने, वैदिक धर्म की प्रचलित व्यवस्थाओं और क्रियाओं पर ऐसी चिरस्मरणीय छाप मारी कि यज्ञ कर्म में पशुबली पर व्यापक अंकुश लगा।

श्री अग्रसेन ने केवल अहिंसा का उपदेश नहीं दिया, अपितु उसे जीवन कर्म बनाया, प्रचलित व्यवस्थाओं से विद्रोह तक करने से वे किंचित नहीं हिचके। ऐसे क्रांतिदूत श्री अग्रसेन ने यज्ञों में शास्त्रसम्मत पशुबली तक को नकार दिया। ग्लानिवश यज्ञ से विमुख हुए ‘महाराजा अग्रसेन’ को समझाते हुये ऋषिगण कहने लगे –

यज्ञार्थं पशव: सृष्टा: स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
यज्ञश्च भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे वधोऽवध:॥

ऋृषियों ने कहा – हे राजन ! आपकी बात उचित है, किन्तु स्वयं ब्रह्मा जी ने यज्ञ के निमित्त एवं सिद्धियों की प्राप्ति हेतु पशुओं की सृष्टि की है, अतएव यज्ञ में दी गई पशुबली वध नहीं, अपितु अहिंसा ही है।

यह सुनते ही महामानव अग्रसेन के हृदय में करुणा व्याप्त हो गई। करुणा जब निरीह होती है तो आंसू बनकर छलक पडती है, किन्तु वही करुणा ……जब प्रतिकार की क्षमता से युक्त होती है तो – विद्रोह बनकर चिन्तन हेतु। प्रश्नचिन्ह खडा कर देती है।

क्रांतिदूत श्री अग्रसेन का वह प्रश्न आज भी सारी सृष्टि को झकझोर रहा है –

वृक्षांश्छित्वा पशून् हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम्।
यद्येवं गम्यते स्वर्गे नरके केन गम्यते ???

श्री अग्रसेन ने कहा – हे मुनिवरों ! वनों को काटने वाले, पशुओं की हत्या करने वाले, तथा भ्रूण हत्यादि रक्तिम कर्म करने वाले ही, यदि स्वर्ग जाएंगे, तो फिर नर्क कौन जाएगा ???

और …..इसप्रकार, श्री अग्रसेन जी ने अपना स्पष्ट अभिमत अभिव्यक्त किया – हे ऋृषिवरों ! मेरे विचार से तो इस प्रकार का आचरण कर्ता, धर्म पुरूष भी बाहर से पवित्र दिखने पर भी, भीतर से अपवित्र ही होगा । उत्तम लक्षणों से युक्त सा प्रतीत होने पर भी, वास्तव में वह उसके विपरीत ही होगा, तथा शीलवान दिखाई देने वाला वह वास्तव में दुःशील ही होगा।

महर्षे ! जगत में जो कदापि हिंसा के योग्य नहीं हैं (अर्थात जो निरीह तथा सर्वथा संरक्षण के योग्य हैं) ऐसे जीवों का अपने ही सुख की कामना करने वाला (स्वार्थी पुरुष) वध करके, इस लोक या परलोक में, भला कैसे किंचित भी सुख प्राप्त कर सकेगा ? ( अर्थात कदापि सुख नही पा सकेगा क्योंकि इस लोक में जीवन भर ग्लानिभाव हृदय को क्लेश देंगे। और मरने पर निश्चय ही उसे इस क्रूर कर्म के पाप का दण्ड भोगना ही पडेग़ा।)

व्यक्तिगत स्वार्थ के मोहवश, बिना अपकार या शत्रुता के ही, दूसरों के प्राणों की बलि देना, मेरी दृष्टि में कदापि योग्य नहीं। मान्यवर ! क्षत्रियों का प्रयोजन होता है – संकट में पडे प्राणियों की रक्षा करना, न कि अपने स्वार्थ के लिये उनकी हिंसा करना। बिना बैर के ही निरीह प्राणियों के प्रति क्रूरता पूर्ण व्यवहार, जगत में सबसे बडा पाप है। और ……श्री अग्रसेन जी ने दृढतापूर्वक बलिप्रथा को नकारते हुए कहा – मुझे नहीं चाहिये ऐसा स्वर्ग कि एक जीव के सुख के लिए दूसरे जीव की हत्या करना पडे।

स्वशरीरमपी परार्थे य: खलु दद्यादयाचित: कृपया ।
स्वसुखस्य कृते च कथं प्राणीवधक्रौर्यमनुमन्ये ॥

हे ऋृषिवरों! प्रभो! परोपकार के लिये तो मैं अपना यह, शरीर भी बिना मांग