Agr-Bhagwat Katha

श्री अग्र-भागवत कथा

समाज में महाराज अग्रसेन की पहचान एक राजा के रूप में है जबकि वास्तविकता यह है कि
महाराजा अग्रसेन कलियुग के अवतारी पुरूष हैं एवं साक्षात भगवान के स्वरूप हैं। इसलिए
उनको महाराजा अग्रसेन के साथ-साथ भगवान अग्रसेन कहना अधिक उपयुक्त है। इसके
लिए आवश्यक है कि समाज में भगवान अग्रसेन के जीवन के अवतारी स्वरूप को प्रतिष्ठित
किया जाए। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए सम्मेलन द्वारा अग्रभागवत कथा के
आयोजन की परम्परा प्रारम्भ की गई। पहली अग्रभागवत कथा अग्रोहा में आयोजित की गई
जिसको सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त जुटे एवं कलश शोभायात्रा निकाली गई।
जब से लेकर आज तक अनगिनत स्थानों पर अग्रभागवत कथा का आयोजन सफलतापूर्वक
किया जा चुका है। अग्रभागवत कथा सुनाने वाले विद्वान आचार्यों की संख्या भी तेजी से बढ़
रही है जिनके द्वारा संगीतमय कथा प्रस्तुत की जाती है। इस कथा को सुनकर सभी लोगों
का मन एवं हृदय आनंद से भर जाता है। इस कथा को सुनने के बाद स्पष्ट होता है कि
भगवान अग्रसेन ने किस प्रकार हिंसा एवं पशु बलि का विरोध करते हुए व क्षत्रिय वंश का
त्याग करते हुए अग्रवंश की स्थापना की। अपनी प्रजा के सुखमय जीवन के लिए कठोर
तपस्या की एवं इस बात को सुनिश्चित किया कि उनके राज्य में कोई भी व्यक्ति रोटी कपड़ा
एवं मकान जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित न रहे। इस कथा को सुनने वाले प्रत्येक व्यक्ति
के मन एवं हृदय में भगवान अग्रसेन का अवतारी स्वरूप हमेशा-हमेशा के लिए विद्यमान हो
जाता है। इसलिए प्रत्येक अग्रबंधु को जीवन में एक बार अग्रभागवत कथा का श्रवण अवश्य
करना चाहिए। सम्मेलन का प्रयास है कि जिस प्रकार आज महाराजा अग्रसेन जयंती गांव-
गांव, शहर-शहर में आयोजित की जा रही है, उसी प्रकार अग्रभागवत कथा का आयोजन भी
प्रत्येक अग्रवाल संस्था एवं प्रत्येक धर्मप्रेमी बंधुओं द्वारा वर्ष में एक बार अवश्य किया
जाये। सम्मेलन का प्रयास तेजी से सफल हो रहा है।